मेरे जीवन की पहली रोल मॉडल, जिन्होंने मुझे एक बेहतर इंसान बनने में मदद की।

आपने देखा होगा कि हर किसी के जीवन में कोई न कोई जरूर होता है जो जाने-अनजाने में उसे जीना सिखा जाता है, ये कहानी है मेरे रोल मॉडल की, जिन्होंने मुझे जीना सिखाया।

कोको (COCO) फ़िल्म का एक दृश्य

पिछले कुछ दिनों से ज़िन्दगी के उस लेवल पर लटका हुआ था, जहाँ से या तो मैं सीधे ज़ीरो पर चला जाता और या फ़िर एकदम टॉप पर, कन्फ्यूज़ था, कि क्या करूँ, किस से शेयर करूँ, कौन मदद कर सकता है मेरी, और सोचने लगा कि काश आज स्नेह आँटी मेरे साथ होतीं, तो मैं कुछ शेयर भी ना करता और उनका चेहरा देखते ही मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल जाते, मग़र अफ़सोस, लगभग 5 साल पहले ही वो मुझे छोड़ कर चली गयीं।

मैं शायद 2 साल की उम्र से जानता हूँ उन्हें, आज से लगभग 24 साल पहले हम उनके घर पर किराये पर रहते थे, उनके घर में बस तीन ही लोग थे, स्नेह आँटी, अंकल और भइया।

तीनों ही मुझे बहुत प्यार करते थे,

स्नेह आँटी की उम्र मेरे पापा से लगभग ना ज्यादा सही तो 6 साल तो रही ही होगी, मग़र बड़ी होने के बावजूद भी वो पापा को भइया बोलती थीं, कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व था उनका।

अंकल के इस दुनिया से जाने के बाद उनका व्यक्तित्व कुछ अलग ही हो गया था, अकेले रहने की बजाय वो हर वक़्त दूसरों की समस्याओं को सुनते और उन्हें हिम्मत के साथ-साथ सॉल्यूशन भी देते, और जाने-अनजाने में उनके इस व्यक्तित्व का मुझपर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ रहा था, वैसे भी वो अकेले में मुझे बहुत कुछ समझाते रहते थे, मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें पूरा विश्वास था कि मैं उनकी सारी बातों को अच्छे से ही समझ रहा हूँ, ऐसा लगता था कि मेरी पूरी परवरिश का जिम्मा उन्होंने अपने सिर पर ले लिया था।

मुझे 2 साल की उम्र में ही गिनती, अंग्रेजी के अल्फाबेट और साथ साथ में पहाड़े और अंग्रेजी के कुछ बेसिक शब्द भी सीखा दिए थे उन्होंने। मुझे आज भी याद है कि जब माँ और स्नेह आँटी मुझे नर्सरी में एडमिशन दिलाने स्कूल लेकर गए थे तो मैंने पहले ही दिन पहाड़े और अंग्रेजी के शब्द लिख कर सबको चौंका दिया था, और स्कूल वालों ने मुझे 1 हफ्ते बाद ही अगली क्लास में प्रमोट कर दिया था।

शाम को वो मोहल्ले के सभी बच्चों को बिठा कर जबरदस्ती ट्यूशन पढाया करती थीं, रात को कभी कभी मैं उनके साथ ही खाना खा कर उनके साथ ही सो जाता था, माँ मुझे सुबह उठा कर नहला कर स्कूल के लिए तैयार कर देती थीं, फ़िर मैं और दीदी स्कूल चले जाते थे, स्नेह आँटी भी उसी स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाते थे।

ये स्नेह आँटी ही थीं जिन्होंने मुझे एक ब्रिलिएंट स्टूडेंट, एक आज्ञाकारी बेटा, एक अच्छा दोस्त और एक समझदार इंसान बनने में मेरी सबसे ज्यादा मदद की, अग़र कल को एक अच्छा पति भी बन पाया तो इसका श्रेय भी उन्हीं को ही जायेगा शायद..

आज मैं जिस भी जगह पर जो भी हूँ, उसमें सबसे ज्यादा योगदान उनका है, और कल को अग़र किसी बड़े पद पर पहुँचता हूँ तो उसका ज्यादातर श्रेय भी उन्हीं को ही जायेगा, और इस बात को माँ-पापा भी अच्छी तरह जानते हैं कि मेरी मानसिक परवरिश में उनका बहुत ही बड़ा योगदान रहा है।

2015 में मैं कानपुर में अपनी इंजीनियरिंग के दूसरे सेमेस्टर में था जब एक दिन घर से फ़ोन आया और पता चला कि स्नेह आँटी को कैंसर हो गया है, मैंने सुना और ये सोचकर इग्नोर कर दिया कि यार वो स्नेह आँटी हैं, बड़ी-बड़ी प्रॉबलम्स को चुटकियों में हल करने की हिम्मत हैं उनमें, ये कौन सा कोई लाइलाज बीमारी है, हो ही जाएंगे ठीक।

और फ़िर कुछ दिन बाद पता चला कि वो हॉस्पिटल में एडमिट हैं..

एक दिन मम्मी और दीदी उनसे मिलने हॉस्पिटल गए और उनसे मेरी फ़ोन पर बात करवायी, उन्होंने जैसा मुझे बनाया था ठीक वैसे ही मैंने उन्हें हिम्मत दी और बोला कि आँटी आप टेंशन मत लेना, बस मेरे एग्जाम खत्म होने दो जून में, मैं तुरंत आऊंगा मिलने,  और वैसे भी आपको कुछ नही होगा, अभी तो आपने मुझे नासा में जाते हुए भी तो देखना है, टेंशन मत लो, ट्रेन से उतरते ही सीधे आपके घर ही आऊंगा…

बस इतनी ही बात हो पायी उनसे, अग़र मुझे पता होता कि ये हमारी आख़िरी बातें हैं तो शायद मैं एग्ज़ाम छोड़ कर उनसे मिलने चला जाता..

लगभग 15 दिन बाद की बात है, मैं बड़ी दीदी के ससुराल में शादी समारोह अटेंड करने गया हुआ था, शाम का वक़्त था, मुझे अभी भी याद है, सूरज ढलने वाला था, और मैं पानी वाला पाईप लगा कर बरामदा धुलवा रहा था, चारों तरफ़ बच्चे खेल रहे थे, कि तभी घर से दीदी का एक टेक्स्ट मैसेज आया कि स्नेह आँटी नहीं रहे, में जानता हूँ कि उन्होंने ये बात मैसेज पर इसीलिए बताई क्योंकि फ़ोन पर बात करने की हिम्मत उस वक़्त उनमें भी नही थी,

मैंने चुप-चाप पाइप नीचे रखी, किचन में जाकर बड़ी दीदी को बताया और कहा कि थोड़ी देर छत पर जा रहा हूँ, कोशिश करना कि कोई डिस्टर्ब ना करने आये मुझे..

इतना कह कर मैं छत पर चला गया, मुझे बिल्कुल भी नही याद है कि उस वक़्त मैं क्या सोच रहा था या क्या चल रहा था मेरे दिमाग़ में, बस इतना पता है कि उनका चेहरा मेरी नज़र के सामने से हट ही नहीं रहा था, बस ऐसा लग रहा था मानो कोई अंग शरीर से अलग हो गया हो, अगले दिन मैकेनिक्स का एग्ज़ाम था, जिसकी वजह से उनकी अन्तयेष्टि में भी शामिल नहीं हो पाया मैं, उन्हें आख़िरी बार देखने की, उनको गले लगाने की इच्छा भी पूरी नही हो पाई, इस बात का दुःख मुझे ज़िंदगी भर रहेगा..

उनकी सिखाई हुई कुछ बातें हैं, जो मुझे आज भी मुँह-जुबानी याद हैं, जैसे कि:-

जीवन में कभी भी कोई समस्या आये तो दूसरों की समस्याओं को सुनो, उनकी मदद करो, इस से तुम्हारी समस्या कब ख़त्म हो जाएगी, तुम्हें पता ही नहीं चलेगा।

कोई तुम्हारे साथ बुरा करता है तो उस से बदला मत लो या उसका बुरा मत सोचो, वरना तुम्हारे और उसमें फ़र्क ही क्या रह जायेगा।

लोगों के, कॉलेज के और सरकारों के भरोसे मत बैठना कभी भी, ज़िन्दगी में इतनी मेहनत करना कि इनमें से किसीके भी सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े।

अग़र तुम किसी दोस्त के लिए हर वक़्त उपस्थित रहो और जब तुम्हें जरूरत पड़े और वो दोस्त तुम्हारी मदद करने ना आये या तुम्हारे दुःख को ना सुने तो दुःखी मत होना, न ही उसके बारे में कोई गलत धारणा बनाना, क्योंकि सबका जीवन है, सबकी समस्याएं हैं, क्या पता वो किस वजह से तुम्हारी मदद नहीं कर पाया।

अग़र तुम्हें कोई अपने यहाँ किसी शादी या फंक्शन में न बुलाये तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम भी उसे नही बुलाओगे, क्योंकि तुम्हें नही पता कि वो किस वजह से तुम्हें नहीं बुला पाया उस वक़्त, और अग़र फिर भी तुमने उसे नहीं बुलाया तो समाज की नज़र में तो तुम दोनों ही गलत ठहराये जाओगे।

पेड़ की तरह सबकी मदद के लिए खड़े रहो, सबको छाँव देते रहो, ये मत देखो कि कोई पानी डालने आ रहा है या नही, क्योंकि अगर कोई पानी नहीं डालेगा, तो बारिश तो तुम्हारे लिए अपना काम कर ही देगी।

अग़र कोई किसी भी विषय में तुमसे अलग सोच रखता है तो उसकी बातों को कभी मत दबाना, बल्कि धैर्यपूर्वक सुनना।

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